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नववर्ष (संवत्सर)
March 24, 2020 • Yogita Mathur • DHARMA KARMA
 
भारतीय सांस्कृतिक गौरव की स्मृतियाँ समेटे हुए अपना नववर्ष (संवत्सर) युगाब्द 5122, विक्रम संवत् 2077 की चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, तद्नुसार 25 अप्रेल, 2020 को प्रारंभ हो रहा है।
सर्वस्पर्शी एवं सर्वग्राह्य भारतीय संस्कृति के दृष्टा मनीषियों और प्राचीन भारतीय खगोल-शास्त्रियों के सूक्ष्म चिन्तन-मनन के आधार पर की गई कालगणना से अपना यह नव-संवत्सर पूर्णतरू वैज्ञानिक एवं प्रकृति-सम्मत तो है ही, हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान एवं सांस्कृतिक ऐतिहासिक धरोहर को पुष्ट करने का पुण्य दिवस भी है -
ऐतिहासिक महत्त्व 
1. ब्रह्मपुराण के अनुसार पूर्णतरूजलमग्न पृथ्वी में से सर्वप्रथम बाहर निकले भू-भाग सुमेरु पर्वत पर 1 अरब  97 करोड़ 29 लाख 49 हजार  121 वर्ष पूर्व इसी दिन के सूर्योदय से ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की।
2. मर्यादा-पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के लंका विजय के बाद अयोध्या आने के पश्चात् यही मंगल-दिन उनके राज्याभिषेक के लिए चुना गया।
3. शक्ति एवं भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्र स्थापना का पहला दिन यही है।
4. सनातन धर्म की रक्षा के लिए वरुणावतार झूलेलाल जी आज ही के दिन अवतरित हुए।
5. समाज को श्रेष्ठ (आर्य) मार्ग पर ले जाने हेतु स्वामी दयानंद सरस्वती ने इसी दिन को आर्य समाज स्थापना दिवस के रूप में चुना।
6. सामाजिक समरसता के अग्रदूत डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म भी आज ही के दिन हुआ।
7. आज से 2077 वर्ष पूर्व राष्ट्रनायक सम्राट् विक्रमादित्य ने विदेशी हमलावर शकों को भारत की धरती से खदेड़ा। अभूतपूर्व विजय के कीर्ति स्तंभ के रूप में कृतज्ञ राष्ट्र ने कालगणना को विक्रमी संवत् कहकर पुकारा।
8. अधर्म पर धर्म का वर्चस्व स्थापित करने वाले सम्राट् युधिष्ठिर का राज्याभिषेक भी इसी दिन हुआ।
9. अपने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाकर भारत माता को पुनरू जगद्गुरू के सिंहासन पर आसीन करने के ध्येय को लेकर चल रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक पूजनीय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार का जन्म भी वर्ष प्रतिपदा के मंगल-दिन ही हुआ।
10. मंत्र दृष्टा एवं न्यायदर्शन के आदि प्रवर्तक ऋषि गौतम का जन्म भी वर्ष-प्रतिपदा को ही हुआ।
11. महाराजा अजयपाल ने आज ही के दिन राजस्थान की हृदयस्थली अजयमेरु की स्थापना की।
12. गुरुमुखी के रचनाकार एवं सिक्ख पंथ के द्वितीय गुरु अंगददेव का प्रकाशोत्सव भी आज ही के पावन दिवस पर है।
वैज्ञानिक महत्त्व 
1. भारतीय कालगणना के अनुसार सृष्टि का निर्माण हुए अब तक 1972949121 वर्ष बीत चुके हैं। आज विश्व के वैज्ञानिक इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं।
2. भारतीय कालगणना विशुद्ध वैज्ञानिक प्रणाली है, इसमें सृष्टि के प्रारंभ से लेकर आज तक सैकण्ड के सौवें भाग का भी अंतर नहीं आया है।
3. भारतीय कालगणना के समय की सबसे छोटी इकाई का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। त्रुटि सैकण्ड का 33750वाँ भाग है। सबसे बड़ी इकाई कल्प 432 करोड़ वर्ष का होता है। इस कल्प का वर्तमान में 7वाँ मन्वन्तर है, जिसका नाम वैवस्वत है। वैवस्वत मन्वन्तर की 71वीं चतुर्युगियों में से 27 बीत चुकीं हैं। 28वीं चतुर्युगी में भी सतयुग, त्रेता, द्वापर बीतकर कलियुग के 5120 वर्ष बीत चुके हैं।
4. सृष्टि का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा रविवार को सूर्य के प्रथम प्रकाश के साथ हुआ, इसलिए इस दिन प्रथम होरा रवि का था। पश्चात् चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि का हो गया, जिन पर सातों दिनों का नामकरण किया गया, जिन्हें आज सम्पूर्ण संसार मानता है।
5. चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहण जैसी घटना अचूक रूप से पूर्णिमा एवं अमावस्या को ही होती हैं।
प्राकृतिक महत्त्व -
इस तिथि के आस-पास प्रकृति में नवीन परिवर्तन एवं उल्लास दिखाई देता है। रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं। वृक्ष एवं लताएँ पुष्पित-पल्लवित होती दिखाई देती हैं। खेतों से फसल कटकर घर में आना प्रारंभ हो जाती है। सूर्य की किरणें पृथ्वी को ऊर्जामयी करने लगती हैं। नक्षत्र शुभ स्थिति में होने से नए कार्यों के प्रारंभ का शुभ मुहूर्त होता है। समाज में उत्साह एवं आनंद का वातावरण दिखाई देता है।
भारतीय संविधान की भावना के अनुसार-
भारतीय कालगणना, संवत्सर किसी विचार या पंथ पर आश्रित नहीं है। अतरू किसी जाति या संप्रदाय विशेष की नहीं है। हमारी गौरवशाली परम्परा विशुद्ध अर्थों में प्रकृति के खगोल-शास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित है। अतरूविक्रमी संवत् का वैचारिक आधार हमारे गणतंत्र में मान्य वर्तमान पंथ-निरपेक्ष स्वरूप को भी पुष्ट करता है।
वर्ष प्रतिपदा के आस-पास ही पडने वाले अंग्रेजी वर्ष के मार्च-अप्रेल से ही दुनिया भर के पुराने कामकाज समेट कर नए कामकाज की रूपरेखा तय की जाती है, चाहे फिर व्यापारिक संस्थानों का लेखा-जोखा हो, करदाता का कर निर्धारण हो या सरकार का बजट।
जब हमारे पास राष्ट्र की दृष्टि से विजयी, विज्ञान की दृष्टि से समयोचित, प्रकृति की दृष्टि से समन्वयकारी, खगोलशास्त्र की दृष्टि से पूर्ण और धार्मिक दृष्टि से पंथ-निरपेक्ष एवं स्वदेशी कालगणना है तो विदेशी, अपूर्ण, अवैज्ञानिक एवं पांथिक कालगणना की ओर अंधाधुंध क्यों भागें? आइए, अपनी-श्रेष्ठ परम्पराओं का अनुसरण करते हुए फिर से एक बार उठें और समूचे विश्व में भारतीय गौरव को प्रतिष्ठित करें

इस तरह करें नववर्ष का स्वागत
’ नववर्ष की पूर्व संध्या पर घरों के बाहर दीपक जलाकर नववर्ष का स्वागत करना चाहिए।
’ नववर्ष के नवप्रभात का स्वागत शंख ध्वनि व शहनाई वादन करके किया जाना चाहिए।
’ घरों, मंदिरों पर ऊ अंकित पताकाएं लगानी चाहिए तथा प्रमुख चैराहों, घरों को सजाना चाहिए।
’ यज्ञ-हवन, संकीर्तन, सहभोज आदि का आयोजन कर उत्साह प्रकट करना चाहिए।
’ अपने मित्रों व संबंधियों को नववर्ष बधाई संदेश भेजने चाहिए।
’ भारतीय कालगणना एवं इसके महत्त्व को उजागर करने वाले लेखों का प्रकाशन एवं गोष्ठियों का आयोजन करना चाहिए।
 
वैज्ञानिक और वैश्विक भारतीय काल गणना

मनुष्य में अपनी स्मृतियों को संजोने की स्वाभाविक इच्छा रहती। वह इन्हें कालक्रमानुसार पुनः स्मरण करना या वर्णन करना भी चाहता है, सम्भवतया इसीलिए समाज विकास के साथ काल गणना की पद्धति का भी विकास हुआ होगा। किन्तु काल गणना का विचार मन में आते ही प्रश्न उत्पन्न होता है कि काल क्या है ? इसका आरम्भ और अन्त कैसे होता है ? भारतीय ऋषियों ने इसके बारे में गइराई से विचार किया है। उन्होने मोक्ष प्राप्ति के साधनभूत द्रव्यों में काल को भी सम्मिलित किया है। इस विषय में वैशेषिक दर्शन के दृष्टा ऋषि कणाद् का कथन है -
‘पृथ्वीव्यापस्तेजो वायुराकाश कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।’
अर्थात पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा, मन ये द्रव्य हैं। मोक्ष प्राप्ति हेतु इनका तत्वज्ञान अनिवार्य है।
व्याकरण की दृष्टि से काल शब्द गत्यर्थक, गणनार्थक अथवा प्रेरणार्थक ‘कल्’ धातु से ‘घ´’ प्रत्यय करने से बनता है। इस प्रकार काल का अस्तित्व गति में निहित है।
काल के रूप:- काल के दो रूप हैं - मूर्तकाल और अमूर्तकाल। काल की सूक्ष्मतम ईकाई, भारतीय गणना में ‘त्रुटि’ है। जिसका मान एक सैकण्ड का 33750वाँ हिस्सा है। काल की दीर्घतम इकाई कल्प है, जिसका मान 432 करोड़ वर्ष है। इसे काल का मूर्त रूप कहते हैं। अमूर्त काल को समझने के लिए घड़ी का उदाहरण ले सकते है। घड़़ी के कांटों से जो सैकण्ड, मिनट, घण्टे बनते हैं, वह काल की प्रगति का फल हैं, परन्तु उनके पीछे की प्रेरक शक्ति अमूर्त, अव्यक्त काल ही है।
काल की उत्पत्ति:- वेद में सृष्टि के प्रारम्भ का वर्णन है, जो विज्ञान के आधुनिक ‘बिग बेंग सिद्धान्त’ (महाविस्फोट सिद्धान्त) का मूलधार है -
हिरण्य गर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम।।
सृष्टि के पूर्व सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ ही विद्यमान था, इससे ही सब भूतों की उत्पत्ति होती है, वहीं इनका एकमात्र विधाता व स्वामी है, उसी ने पूर्व में गगन पर्यन्त सभी (तत्वों) को आधार व अस्तित्व प्रदान किया है, हम उस आदि देव को छोड़कर किसे अपना हविष्य प्रदान करें।
इस हिरण्मय अण्ड के विस्फोट से विश्व द्रव्य (मेटर) का प्रथम पदार्थ जब गतिमान होता है तो सर्वप्रथम काल की स्थापना होती है। काल सापेक्ष है अतः सृष्टि के आदि बिन्दु से इसका प्रारम्भ मानकर - काल-प्रवाह की गणना की जाती है। बिना काल के इतिहास हो ही नहीं सकता।
मनवन्तर विज्ञान:- इस पृथ्वी के सम्पूर्ण इतिहास की कुंजी मनवन्तर विज्ञान में है। इस गणना से पृथ्वी की आयु लगभग उतनी ही आती है, जितनी आज के वैज्ञानिक मानते हैं। पृथ्वी की सम्पूर्ण आयु को 14 भागों में बांटा गया है, जिन्हें मनवन्तर कहते है। एक मनवन्तर की अवधि 30 करोड़ 67 लाख 20 हजार वर्ष होती है। प्रत्येक मनवन्तर में एक मनु होता है। अब तक 6 मनु-स्वायम्भुव, स्वारोचिष, औत्तय, तामस, रैवत तथा चाक्षुष हो चुके हैं। अभी सातवाँ ‘वैवस्वत’ मनवन्तर चल रहा है। प्रत्येक मनवन्तर प्रलय से समाप्त होता है। इस प्रकार अब तक 6 प्रलय, 447 महायुगी खण्ड प्रलय तथा 1341 लद्यु युग प्रलय हो चुके हैं।
एक मनवन्तर में 71 चतुर्युगियाँ होती हैं। एक चतुर्युगी 43 लाख 20 हजार वर्ष की होती है।
भारतीय काल गणना की विशेषता:- भारतीय कालगणना का वैशिष्ट्य यह है कि यह उस काल तत्व पर आधारित है जो सारे ब्राह्माण्ड को व्याप्त करता है। इसके कारण यह विश्व की अन्य कालगणनाओं की भांति किसी घटना विशेष, व्यक्ति विशेष पर आधारित। किसी देश विशेष की काल गणना नहीं है। नक्षत्रों की गतियों पर आधारित यह काल-गणना समस्त ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति एवं पृथ्वी पर सृष्टि-चक्र के प्रारम्भ को रंगित करती है, और इसी कारण यह काल-गणना वैज्ञानिक एवं वैश्विक है।
स्थूल रूप में काल गणना प्राकृतिक, भोगौलिक, राजनैतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक, ऐतिहासिक चेतना की द्योतक होती है, जैसे - सृष्टि का प्रारम्भ, सम्वतों का प्रारम्भ, राम का राज्यारोहण, नवरात्र प्रारम्भ, झूलेलाल अवतरण, गुरू अर्जुन देव का प्राकट्य दिवस, संघ संस्थापक डाॅक्टर हेडगेवार जयंती, आर्य समाज, राजस्थान व अजमेर स्थापना दिवस आदि। किन्तु स्मरण रहे इन घटनाओं से नव सम्वत्सर का महत्व नहीं है। ये घटनाएँ नव सम्वत्सर को हुई अतः ये स्मरणीय हैं।
 
‘‘पाश्चात्य और भारतीय काल गणना’’

आजकल जो ईस्वी सन् के रूप में प्रसिद्ध है, उसका ईसाई रिलिजन या ईसा के जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। मूलरूप से यह उत्तरी यूरोप के अर्धसभ्य कबीलों का कैलेण्डर था, जो मार्च से अपना नया वर्ष प्रारम्भ करते थे। प्रारम्भ के दो महीने शीत निष्क्रियता में बीतते थे। इस समय गुफाओं में रहने के कारण वे शेष दुनियाँ से कटे रहते थे, इसलिए इन दिनों की वे वर्ष में गणना ही नहीं करते थे। इस कैलेण्डर में दस महीने व 304 दिन होते थे। इन दस महीनों के नाम भी संस्कृत से व्युत्पन्न थे जैसे - सातवें, आठवें, नवें तथा दसवें मास के नाम क्रमशः सेप्टेम्बर (सप्त), ओक्टाम्बर (ओक्ट = अष्ट), नवम्बर (नवम्), दिसम्बर (दशम्) थे। ग् . डंे का अर्थ एक्स-मस या क्रिसमस नहीं है। रोमन में ग् अर्थात दस होता, अतः यह दशम्-मास है।
इस कैलेण्डर में सर्वप्रथम संशोधन रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने किया। इसे ही रोमन कैलेण्डर कहते हैं। आज के तथाकथित ईस्वी सन् के 44 वर्ष पूर्व जूलियस सीजर ने मिश्र पर विजय प्राप्त करने की स्मृति में अपना संशोधित कैलेण्डर प्रचलित किया। इसके लिए उसकी सहायता मिश्र के प्रसिद्ध ज्योतिषि व खगोलशास्त्री सोसीजेनेस ने की। यह कैलेण्डर 365( (सवा तीन सौ पैसठ दिन) का था। वर्ष के इन दिनों की गणना के लिए चार साल के अंतराल में एक लीप ईयर की व्यवस्था की गई। यह दिन की घटत-बढ़त फरवरी में ही क्यों की ? यह भी रोचक तथ्य है। जूलियन कैलेण्डर के मास क्रम या उन के दिनों की संख्या का खगोलीय घटना या गृह - नक्षत्रों की गति से कोई सम्बन्ध नहीं है। दस माह के कैलेण्डर में दो मास बढ़ाने थे अतः रोम सम्राट जूलियस ने अपने नाम से जुलाई तथा सम्राट आगस्टस ने अगस्त जोड़ दिया। दोनों सम्राट थे। अपने-अपने महीने 31 दिन के कर लिए, भुगतना फरवरी को पड़ा, उसे 28 दिन पर ही संतोष करना पड़ा। उसके साथ हुए अन्याय की भरपाई के लिए ‘‘लीप ईयर’’ का एक दिन उसे कृपापूर्वक देने की घोषणा की गई।
वर्तमान ईस्वी सन् जूलियन कैलेण्डर के लगभग 530 वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद प्रारम्भ हुआ। है ना आश्चर्यजनक, ईस्वी सन् के पैदा होने के 530 वर्ष पहले के काल खण्ड का नामकरण ईस्वी सन् करते हैं और उससे पूर्व का ईसा पूर्व। एक सीथियन पादरी डायोनिसियस एक्सीजुअस ने अपनी गणना लगाकर ईसा का जन्म दिवस 25 दिसम्बर निर्धारित किया और जूलियन कैलेण्डर को ईसा के जन्म से सम्बद्ध कर ईस्वी सन् प्रचलित कर दिया।
25 दिसम्बर यूरोप व एशिया के कई देशों जैसे मिश्र, बेबिलोन (इराक), फारस (इरान) में मित्र अर्थात सूर्य की पूजा का परम्परागत उत्सव था। मिश्र भी सूर्य के पर्यायवाची शब्द ‘मित्र’ का ही अपभुंश उच्चारण है।
जूलियन कैलेण्डर भी परिपूर्ण नहीं है। यह समायोजन केवल भारतीय पंचांग में ही सम्भव है। कैलेण्डर पंचांग नहीं है। पंचांग में पाँच गणनाएँ - तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग होती हैं। पंचांग खगोलीय घटनाओं का दिग्दर्शक जीवमान अभिकरण है, कैलेण्डर शुष्क गणनाओं की गणित-विहीन जोड़-तोड़ की टिप्पणी है।
गणना की त्रुटि सुधारने के लिए ही पोप ग्रेगरी तेरहवें ने एक आज्ञा प्रसारित कर कैलेण्डर को एक ही दिन में दस दिन आगे बढ़ा दिया, अर्थात 05 अक्टूबर शुक्रवार को 15 अक्टूबर शुक्रवार माना गया। यद्यपि पोप का आदेश मानने के लिए ईसाई देश बाध्य थे, किन्तु इस परिवर्तित ग्रेगोरियन कैलेण्डर को यूरोप के देशों ने आसानी से नहीं अपनाया। पोप ने 1572 ईस्वी में आदेश प्रसारित किये थे, किन्तु इंग्लैण्ड ने इसे 1752 ईस्वी में अपनाया। चीन, अलबानिया, बलगेरिया, रूस, रोमानिया ग्रीस, तुर्की आदि देशों ने तो इसे बीसवीं सदी में स्वीकार किया। भारत में भी यह अंग्रेजों का शासन स्थापित होने के बाद राजाज्ञा से प्रचलित किया गया। यह कैलेण्डर न किसी खगोलीय गणना पर आधारित है, न प्रकृति चक्र पर। इसके महीनों में दिनों की संख्या का भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
भारतीय काल गणना अत्यन्त वैज्ञानिक सटीक तथा प्रकृति व खगोल की घटनाओं के अनुरूप है। इसीलिए हमारे दैनिक व्यवहार, व्रत-त्यौहार, विवाह आदि शुभ कार्य यहाँ तक कि शोक प्रसंग भी पंचांग के अनुसार होते हैं, दिनांक के अनुसार नहीं। भारत में ग्रह-नक्षत्रों व सौर मण्डल की परिघटनाओं का अध्ययन करने के लिए सौर वर्ष है। जैसे यह भ्रांति है कि मकर संक्रांति 14 जनवरी को ही आती है। स्वामी विवेकानन्द का जन्म मकर संक्रांति को हुआ था। उस दिन 12 जनवरी थी। वास्तव में मकर संक्रांति सौर माघ मास की प्रतिपदा को आती है,, यह खगोलीय सत्य है। सूर्य, चन्द्र ग्रहण, समुद्र में ज्वार-भाटे, पूर्णिमा, अमावस्या की पूर्व घोषणा हिन्दू पंचांग से सम्भव है, ग्रेगोरियन कैलेण्डर से नहीं।
दैनिक जीवन में तिथियों की गणना चन्द्रमास से ही की जाती है, यह व्यावहारिक है। इस्लाम में भी चन्द्र मास प्रचलित है किन्तु गणना अवैज्ञानिक है क्योंकि सौर वर्ष से इसका समायोजन नहीं किया जाता। हिन्दू मास में सौर वर्ष से समायोजन के लिए ही अधिक मास या पुरूषोत्तम मास की व्यवस्था की गई है। पंचांग में पूर्णिमा व अमावस्या की घोषणा को एक बालक भी आकाश की तरफ देखकर अनुभव कर सकता है। तिथियों की घटत-बढ़त भी वैज्ञानिक है, सूर्योदय के आधार पर तिथि का निर्धारण होता है।
प्राचीन गणनाओं को छोड़ भी दिया जाय और केवल कलियुग की गणना को ही देखें तो भारतीय खगोल शास्त्रियों की विलक्षण प्रतिभा के दर्शन होते हैं। इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को कलियुग के 5121 वर्ष पूर्व होकर 5122वाँ वर्ष प्रारम्भ होगा।
पाटलीपुत्र के प्रसिद्ध खगोल शास्त्री आर्यभट्ट ने उस समय गणना करके बताया कि जब 23 वर्ष के थे तब कलियुग के 3600 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। इस आधार पर कलियुग का प्रारम्भ ईसा पूर्व सन् 3102 में हुआ। उनकी इस खगोलीय गणना का आधार यह था कि कलियुग के प्रारम्भ के दिन सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्य सभी ग्रह अपने परिक्रमा पथ के एक ही कक्ष में एक साथ थे। कलियुग के प्रारम्भ के दिन तथा वर्तमान श्वेत वाराह कल्प के प्रारम्भ के दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि तथा रविवार था, ऐसा सभी प्राचीन ज्योतिर्विदों का मत था।
जिस मास की पूर्णिमा को जो नक्षत्र पड़ता है, उसी के आधार पर भारतीय मासों के नाम होते हैं - चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ, फाल्गुन - ये सभी नाम नक्षत्रों के आधार पर ही हैं। इस प्रकार विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक काल गणना से निर्मित पंचांग हमारी थाति है, इसके गौरव का स्मरण व पुनस्र्थापन के संकल्प का दिन नव सम्वत्सर है।