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मैं साहित्य का भगोड़ा हूं – राज शेखर
January 19, 2020 • Yogita Mathur • BOLLYWOOD

जयपुरJaipur19 जनवरी। जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल-जिफ 2020 के तीसरे दिन जहां सिलेसिलेवार फिल्मों का मेला सजा, वहीं फिल्मी पर्दे से जुड़े अहम् मुद्दों पर भी दिग्गजों ने अपनी बात रखी। इंटरनेशनल को – प्रोडक्शन मीट हुई, जहां फिल्म निर्माताओं ने आपसी संवाद किया।

गौरतलब है कि जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल-जिफ 2020 पर्यटन विभाग, राजस्थान सरकार के सहयोग से 21 जनवरी तक आयनॉक्स सिनेमा हॉल, जी.टी. सेन्ट्रल और होटल क्लाक्स आमेर में आयोजित हो रहा है।

 

कई पुरस्कार और ख़िताब अपने नाम कर चुकी फिल्म स्पॉटलाइट की स्पेशल नॉन कॉमर्शियल स्क्रीनिंग रखी गई। विशेष तौर पर मीडियाकर्मियों और पत्रकारों के लिए हरीदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय की ओर से फिल्म का प्रदर्शन किया गया। स्पॉटलाइट एक अमेरिकन बायोग्राफिकल ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन टॉम मैकेर्थी ने किया है। 2015 में बनी यह फिल्म अमेरीका के सबसे पुराने अख़बार की खोजी पत्रकारिता के बारे में है। उल्लेखनीय है कि स्पॉट लाइट टीम को इन न्यूज़ स्टोरीज़ के लिए पब्लिक सर्विस के लिए पुलित्जर प्राइज 2003 दिया गया। फिल्म बेस्ट पिक्चर के लिए ऑस्कर अवॉर्ड हासिल कर चुकी है। पत्रकारों ने फिल्म को बहुत पसंद किया।

एल.जी.बी.टी. कम्यूनिटी के मुद्दों पर हो बातचीत – मयूर कटारिया

दोपहर 11:30 बजे ऑडियंस ऑफ 21 सेंचुरी – देयर सेंसेज एंड सेंसिबिलिटीज पर सैशन हुआ, जिसमें फिल्म निर्देशक हरीहरन, तनु वेड्स मनु रिटन्सतुम्बाडवीरे दी वैडिंगहिचकी और उरी जैसी फिल्मों में लिरिक्स राइटर रहे राज शेखर, पत्रकार और लेखक तेजपाल सिंह धामा, ऑस्ट्रेलिया के फिल्म मेकर मयूर कटारिया ने अपने विचार रखे। फिल्म मेकर लोम हर्ष ने मॉडरेटर की भूमिका निभाई। सत्र में फ्रीडम ऑफ स्पीच और एल.जी.बी.टी. कम्यूनिटी जैसे संवेदनशील मसलों पर बातचीत की गई।

बहुतेरी फिल्मों के लिए गीत लिख चुके राज शेखर ने चुटकी लेने के अंदाज में कहा कि उन्हें लिखने के लिए सबसे अधिक प्रोड्यूसर्स से मिलने वाले चैक प्रेरित करते हैं। वहीं, सत्र के दौरान तेजपाल सिंह धामा ने बताया कि उनका पहला उपन्यास अजय अग्नि उन्होने अपनी पत्नी के लिए लिखा था, ताकि वे उन्हें भारत की प्राचीन नारियों के गर्व भरे इतिहास से परिचित करा सकें। गौरतलब है कि पद्मावत फिल्म, जो देश भर में चर्चा का विषय रही थी, वह इनके उपन्यास अग्नि की लपटें पर आधारित है। धामा ने बताया कि उनकी किताबों पर मुकदमें भी चले हैं, और उन्होने पद्मावत फिल्म से जुड़ा किस्सा भी साझा किया, कि किस तरह वे फिल्मी लोगों की बातों में फंस गए। धामा ने कहा कि भारतीय सिनेमा कॉमर्शियल ज्यादा है, और जवाबदेह कम। ऐसे में पत्रकारिता और सिनेमा की दुनिया में ईमानदारी होना बहुत ज़रूरी है।

ट्रांसजेडर फिल्में बनाने वाले मयूर कटारिया ने सैशन के दौरान उग्र स्वर में कहा कि भारत ही ऐसा देश है, जहां 50 लाख से अधिक किन्नर हैं, उन्हें देश में मान्यता भी मिली हुई है, लेकिन फिर भी वे बहुत पिछड़े हुए हैं। उन्हें आज भी बुनियादी शिक्षा और अन्य सुविधाएं हासिल नहीं हैं। एल.जी.बी.टी. समुदाय से जुड़े मुद्दों को सामने लाने की बहुत ज़रुरत है। गौरतलब है कि सत्र में ट्रांसजेडर एक्टर्स भी मौजूद थे, जिन्होने विषय पर अपनी सहमति ज़ाहिर की।

मैं साहित्य का भगोड़ा हूं – राज शेखर

दिन की ख़ास गतिविधि रही फिल्मी गीतों पर हुई रोचक बातचीत, जिसमें तनु वेड्स मनु, उरी, सांड की आंख, तुम्बाड़ जैसे बड़ी फिल्मों के लिए गीत रचने वाले राज शेखर ने दिल खोलकर अपनी बातें रखीं। 

बड़े ही चुटीले अंदाज में शेखर ने कहा कि मैं साहित्य का भगोड़ा हूं, और लिरिसिस्ट बनना मेरी जिंदगी में एक्सीडेंट की तरह हुआ है। शेखर ने बताया कि तनु वेड्स मनु फिल्म का बहुत कामयाब रहा गीत मैं घणी बावली होगी उन्होने महज़ तीन घंटे में लिख दिया था। बिहार के मधेपुरा गांव के रहने वाले शेखर ने किस्सागोई के अंदाज में बताया कि जब उनके सारे दोस्त दिल्ली छोड़कर मुंबई आए, तो उन्होने भी मुंबई का रुख कर लिया। असिस्टेंट डायरेक्शन से करियर शुरु करने वाले शेखर आगे जाकर कामयाब लिरिसिस्ट बन गए।

गीत लिखने की प्रक्रिया के बारे में शेखर ने कहा कि अब फिल्मों में गीत आम बोलचाल की भाषा में बनने लगे हैं। वहीं शेखर ने यह भी कहा कि आज भी लेखकों को सॉन्ग राइटिंग के क्रेडिट्स में नाम नहीं मिल पाता, और उन्हें इसके लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है।

12:35 बजे राजस्थानी सिनेमा – एन इनविटेशन फॉर न्यू बिगनिंग 1942 – 2019 विषय पर डॉ. राकेश गोस्वामी ने अपने विचार रखे, जहां मॉडरेटर रहे वरिष्ठ पत्रकार विनोद भारद्वाज। यहां राजस्थानी सिनेमा को लेकर बातचीत हुई, जिसमें उन्होंने राजस्थानी सिनेमा के विकास तथा उसके सामने आने वाली परेशानियों के बारे में चर्चा की। राकेश गोस्वामी ने  बताया कि राजस्थानी सिनेमा की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि राजस्थानी फिल्मकार एक अच्छी  फिल्म बनाना ही नहीं चाहते है। राजस्थान में फिल्में कम बन रही है, और उनकी पब्लिसिटी भी नहीं के बराबर है। ऐसे में यह सबसे बड़ा कारण है कि क्षेत्रीय सिनेमा में राजस्थान सिनेमा का नाम  नहीं के बराबर है।