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कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना ग्रामों में प्राथमिकता दी जावें
April 4, 2020 • Yogita Mathur • RAJASTHAN

जयपुर Jaipur , 4 अप्रेल । किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने राज्यपाल कलराज मिश्र को आज पत्र लिखकर देश में उत्पन्न परिस्थितियों को सकारात्मक भाव से लेकर भविष्य में ग्राम आधारित व्यवस्था का निर्माण किया जावें, जिसमे कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना ग्रामों में किये जाने को प्राथमिकता देने की मांग की है ।
 

किसान महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामपाल जाट ने केन्द्र सरकार द्वारा किसानों के लिए की गई घोषणाओं की चर्चा करते हुए किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हे आर्थिक आत्मनिर्भर बनाने केलिए सुझाव  भी दिये है ।
   

राष्ट्रीय अध्यक्ष ने राज्यपाल को  लिखा पत्र ​आपकी जानकारी दे लिए दिया जा रहा है ,ताकि आप भी इससेे अवगत करे ।

देश के किसानो को कोविड-19 कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए किसानो, व्यापारियों एवं अन्य के लिए भारत के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने 02 अप्रेल गुरुवार को राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) की प्रभावशीलता बढाने के लिए तीन प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए घोषणा की है उनका बिन्दुवार विश्लेषण निम्नप्रकार है:

(क) ई-नाम में गोदामों से व्यापार की सुविधा के लिए वेयरहाउस आधारित ट्रेडिंग मोड्यूल- देश में 2007 में वेयरहाउस (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 2007 में वेयरहाउस की रसीद के आधार पर 80% ऋण लेने के प्रावधान है 13 वर्ष में इसकी प्रगति नगण्य है राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) 14 अप्रेल 2016 से प्रारम्भ किया गया जिसे 4 वर्ष की अवधि पूर्ण होने की ओर है अभी तक इस श्रेणी में 585 मंडियां है ओर इनके अतिरिक्त 415 मंडियों को इसके अन्दर लाने की घोषणा भर है, जिसकी अवधि का उल्लेख नहीं किया गया है इसका भी प्रभावी कार्यान्वयन नहीं होने के कारण किसानो को उनकी उपजों का उचित दाम प्राप्त होने का मार्ग प्रशस्त हुआ तथा ना ही इसके सकारात्मक परिणाम आये

(ख) एफपीओ का ट्रेडिंग मोड्यूल, जहाँ एफपीओ अपने संग्रह से उत्पाद को लाये बिना व्यापार कर सकते है:- विद्यमान समय में देश मे पंजीकृत एफपीओ (farmer producer organization) की संख्या 843 है तथा पंजीकरण की प्रक्रिया में 67 है, इन दोनों का योग भी 910 है देश में गाँव की संख्या लगभग 6,49,481 (छ लाख उन्नचास हजार चार सो इक्यासी) है ऐसी स्थिति में देश भर की कृषि उपजों को उचित मूल्य दिलाने का यह स्वप्न मात्र है

को उचित मूल्य दिलाने का यह स्वप्न मात्र है (ग) इस जंक्शन पर अंतर-मंडी तथा अंतरराज्यीय व्यापार की सुविधा के साथ लॉजिस्टिक मोडयूल का नया संस्करण, जिससे पौने चार लाख ट्रक जुड़े रहेंगे:- देश में परिवहन के लिए पूर्व से ही चार लाख से अधिक ट्रकों की उपलब्धता है, इसमें नया कुछ भी नहीं है सभी राज्यों को साथ लेकर जिस तैयारी एवं तंत्र विकसित कर योजना के क्रियान्वयन के लिए गंभीरता दर्शित नहीं होती है फिर भी किसानो को उनकी उपजों के दाम प्राप्त हो जाए तो देश के किसान सरकार को धन्यवाद ज्ञापित करेंगे अच्छा हो की किसानो ओर से ज्ञापन में उल्लेखित सुझावों के आधार पर कोरोना संक्रमण को रोकने की प्रभावी कार्यवाही कर किसानो को उपजों का उचित मूल्य दिलाकर देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का कार्य करें

आप केंद्र सरकार के प्रतिनिधि है तथा राज्य की कार्यपालिका के प्रमुख भी है, इस लिए यह ज्ञापन आपको प्रेषित है:न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्ति के निम्न उपाय सार्थक रह सकते है(i) न्यूनतम समर्थन मूल्य से ही खरीद आरम्भ हो, न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामो पर खरीद को आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन कर दंडनीय अपराध बनाया जावें इसके लिए अनेक राज्यों के कृषि उपज मंडी कानूनों में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों में क्रय विक्रय रोकने के लिए प्रावधान हैं, आवश्यक हो तो उनकी पालना के लिए समुचित संशोधन किये जावें यथा - राजस्थान कृषि उपज मंडी अधिनियम, 1961 की धारा 9 (2) (xii) के प्रावधान की पालना में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों पर बिक्री को रोकने के लिए शासन एवं प्रशासन इस को प्राथमिकता दें इसके अंतर्गत कृषि उपज मंडी नियम, 1963 के नियम 64 (3) में संशोधन कर नीलामी बोली न्यूनतम समर्थन मूल्य से आरंभ की जावे

(ii) ग्राम स्तर पर वर्ष भर दाने - दाने की खरीद चालू रहे, इसके लिए प्राथमिक कृषि ऋण दात्री समितियों पर स्थाई खरीद केंद्र बनाए जावे (iii) आयात - निर्यात नीति को किसान हितों के अनुकूल बना जावे विदेशों से आने वाले पाम आयल को तत्काल रोका जाए, यह स्वाद और सुगंध हीन पेड़ों का तरल पदार्थ है, जो खाद्य तेल की परिधि में नहीं आता है, उसके उपरांत भी भारत में इसको अन्य खाद्य तेलों में मिलाकर बेचा जाता है, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव आता है इसी प्रकार विदेशों से दालों के आयात की आवश्यकता नहीं है, दालों में भारत आत्मनिर्भर बनने की ओर है, उसके उपरांत भी दालों का आयात न्यूनतम समर्थन मूल्य से दोगुने दाम चुका कर किया जा रहा है परिणामत: तिलहन एवं दलहन के दाम बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम हो जाते है सरकार द्वारा उपज की सम्पूर्ण खरीद नहीं करने के कारण किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों पर अपनी तिलहन एवं दलहन की फसलें बेचने को विवश होना पड़ता है । इसे आयात - निर्यात नीति को किसानो के अनुकूल बना कर किसानो को न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्राप्ति सुनिश्चित की जा सकती है 1. इन उपायों के संबंध में निम्न सुझाव भी महत्वपूर्ण हो सकते है :

(क) जनवितरण प्रणाली में ग्राम एवं वार्ड स्तर तक तंत्र विद्यमान है, जब तक खरीद का नया तंत्र खड़ा नहीं हो, तब तक प्राथमिक ऋणदात्री सहकारी समितियों का सहयोग लेकर कृषि उपजों की खरीद की व्यवस्था की जावें । उत्पादक किसान को आश्वस्त किया जावें कि खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य से आरम्भ होकर वर्ष भर ग्राम स्तर पर चालू रहेगी, इससे भीड़ जुटने से रुकेगी

(ख) एक स्थान पर एकत्र व्यक्तियों की संख्या न्यूनतम एवं नियंत्रित रखने के प्रयोजन के लिए प्राथमिक ऋणदात्री सहकारी समितियों को कृषि उपज मंडी समितियों या अन्य सक्षम प्राधिकरण द्वारा व्यापार करने की अनुज्ञा दी जावें, जिससे जिन उपजों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित है, उनके अतिरिक्त भी सभी कृषि उपजों की निरंतर खरीद चलती रहें तथा बाजार में किसी भी उपज का भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से अधिक हो तो ग्राम सेवा सहकारी समितियों को भी खरीद के लिए अधिकृत किया जावें इसके लिए श्रमिकों की आवश्यकता की पूर्ती उन्ही गाँवो से की जावें फसलों की क्षति की पूर्ती एवं फसल खरीद का सम्पूर्ण भुगतान किसानो के खातों में सीधा ही किया जावें इससे जहाँ उत्पादक को आर्थिक संबल मिलेगा, वही उपभोक्ताओं को भी स्थानीय स्तर पर सभी प्रकार की खाध्य सामग्री प्राप्त हो सकेगी इससे देश का अर्थ तंत्र गतिमान रह सकेगा।

(ग) न्यूनतम समर्थन मूल्य पर जिस कृषि उपज की जिस गाँव में खरीद हो उस गाँव की आवश्यकता अनुसार उसे उसी गाँव में वितरण किये जाने की व्यवस्था की जावें । आवश्यकता की पूर्ती से अधिक संग्रहित कृषि उपजों का वितरण निकटतम गांवों/शहरों में विद्यमान जनवितरण प्रणाली द्वारा किया जावें

(घ) विद्यमान परिस्थितियों में चलते-फिरते हो न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था ग्राम स्तर पर, घोषणा हो कि यह खरीद 365 दिन चालू रहेगी, आरंभ में न्यूनतम मात्रा में खरीद कर सभी को न्यूनतम समर्थन मूल्य से लाभान्वित करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं

(ङ) खसरा गिरदावरी एवं खरीद केंद्र दोनों ही सरकारी है, इस कारण खसरा गिरदावरी पटवारियों से लेकर खरीद केंद्र तक देने का काम किसान से नहीं कराया जावें वरन पटवारियों द्वारा खरीद केन्द्रों पर खसरा गिरदावरी का विवरण यथासंभव ऑनलाइन मंगवा लिया जावें, इससे पटवारियों के पास होने वाली भीड़ समाप्त हो जाएगी, किसान भी लूट ओर अपमान से बचेगा

(च) कृषि उपज मंडी कानून के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों में कृषि उपजों का क्रय विक्रय अनुज्ञेय नहीं है, इस कारण कृषि विपणन बोर्ड एवं कृषि उपज मंडी समिति सहित संपूर्ण प्रशासन एवं शासन को इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देकर कार्य आरंभ करना चाहिए यही वर्तमान परिस्थितियों में समीचीन है इससे कोरोना संकट से निपटने के लिए ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को सही रखा जा सकता है

(छ) भावांतर भुगतान योजना आरंभ कर बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दामों पर उपजों को बेचने से हुए घाटे की पूर्ति “अंतर राशि” देकर की जावे

(ज) न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए पंजीयन बायोमेट्रिक हो या ओ.टी.पी., इस बहस को समाप्त कर पंजीयन के लिए किसानों को विकल्प हो कि वह अपनी ग्राम सेवा सहकारी समिति पर उपस्थित होकर पंजीयन करा ले या ऑनलाइन पंजीयन देश में किसी भी ई-मित्र या अन्य माध्यम से करा लें संबंधित ई-मित्र पर पंजीयन की बाध्यता समाप्त करने से किसानों की होने वाली लूट व पंजीयन से वंचित रहने की समस्या समाप्त हो सकेगी

2. 

कृषि अर्थव्यवस्था के बारे में भी अग्रिम विचार कर योजना बनानी चाहिए क्योंकि मूल उत्पादन कृषि क्षेत्र में होते है, अन्य उत्पादन तो रूप परिवर्तन है, मूल उत्पादन की श्रृंखला को बनाये रखना विशाल जनसँख्या को दृष्टिगत रखते हुए अपरिहार्य है इस दिशा में केंद्र एवं राज्य सरकारों ने जो कदम उठाये है, वे आवश्यकता की तुलना में नगण्य है कृषि जैसे सर्वाधिक जोखिम भरें क्षेत्र के निरंतर आपदाग्रस्त लोगो की सहायतार्थ निम्नांकित सुझाव है:

 

(क) प्रकृति की मार के कारण किसानों को फसलों की बर्बादी से हुए नुकसान की भरपाई प्रधानमंत्री (क) प्रकृति की मार के कारण किसानों को फसलों की बर्बादी से हुए नुकसान की भरपाई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना एवं केंद्र व राज्य सरकारों के आपदा प्रबंधन कोष से तत्काल कराई जावे

(ख) जिन किसानों की प्रकृति की मार के कारण फसल खराब होने पर असामयिक मौत हो गई, उनके आश्रितों को पांच लाख रुपये की सहायता दी जावे, उन परिवारों को सभी प्रकार के कृषि ऋणों से मुक्त किया जावें तथा सरकारी कर्मचारियों की भांति अनुकंपात्मक नियम बनाकर उनके आश्रितों में से एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी दी जाए

(ग) पटवारी हल्का द्वारा गिरदावरी में किस खसरा नंबर में क्या फसल बोई गई इसका अंकन किया जाता है किंतु किस फसल में कितनी क्षति हुई इसका आकलन का माध्यम गिरदावरी नहीं है इसमें प्रभावित पीड़ित किसान की फसल की क्षति हुई है उससे उसके बारे में गिरदावरी में न तो पूछा जाता है तथा न ही क्षति के आकलन के उपरांत उसको बताया जाता है, और उसे सही करने का या आपत्ति करने का अवसर भी नहीं दिया जाता है इसमें पारदर्शिता का पूर्णत अभाव तथा यह प्राकर्तिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है यह मात्र शासन के अनुकूल प्रलेख तैयार करने का शासन के लिए सुविधा अनुकूल कार्य है जिसका पीड़ित प्रभावित किसान को न्याय पूर्ण सहायता प्राप्ति से कोई संबंध नहीं है

(घ) बेमौसम बरसात में किसानों की पकी हुई फसल और कटी हुई फसल में खराब हुई, उसके आकलन के लिए वर्तमान तकनीकी युग में गिरदावरी की रट छोड़कर इसका सर्वे ड्रोन या किसी अत्याधुनिक उपकरण/यंत्र द्वारा कराया जावे इसे पुष्ट करने के लिए ग्राम स्तर पर पांच व्यक्तियों की विशेषज्ञ समिति का गठन किया जावे, जिसमें सरकारी प्रतिनिधि के रूप में भूमि की पहचान करने वाले पटवारी हल्का, कृषि उपज की स्थिति जानने के लिए कृषि पर्यवेक्षक, जनप्रतिनिधियों में ग्राम पंचायत का सरपंच, ग्राम सेवा सहकारी समिति का अध्यक्ष तथा प्रभावित और पीड़ित किसान को समिति के सदस्य के रूप में रखा जावें यह समिति तीन दिन में आकलन कर दे सकती है पीड़ित किसानों को सरकार द्वारा सहायता एक सप्ताह में प्रदान की जा सकती है क्षति की राशि के आकलन के लिए वर्ष 2010 में प्रधान मंत्री कार्यालय द्वारा चार भिन्न - भिन्न दलों के मुख्य मंत्रियों की समिति की अनुशंसा के अनुसार प्रति हेक्टेयर कम से कम 25,000 (पच्चीस हजार) रुपये की क्षतिपूर्ति देने का प्रावधान किया जावें, जिसे मूल्य सूचकांक से जोड़ने पर वर्तमान में यह राशि 50,000 रुपये (पचास हजार)प्रति हेक्टर होती है

3. कोविड-19 से निपटने के लिए तात्कालिक उपाय निम्न है:

(क) पकी हुई कृषि उपजों को तैयार कर किसानो की चाहत के अनुसार घरों तक लाने की प्रक्रिया को सरल एवं पारदर्शी रखने के लिए बैलगाड़ी, कटाई मशीने, कम्पाइन मशीने, थ्रेशर, माल ढोने के लिए ट्रेक्टर आदि वाहनों को कृषि प्रयोजनार्थ आवश्यक सेवाओं में सम्मिलित किया जावें जिससे मजदूरों को काम करने, कटाई, निकासी, परिवहन, भण्डारण, प्रसंस्करण और बिक्री व्यवस्था सुचारू रूप से चल सकें।

(ख) आगामी खरीफ फसल की बुबाई के लिए खाद, बीज, कीटनाशक जैसी आवश्यक कृषि में प्रयुक्त होने वाली सामग्री एवं उनके लिए वांछित संसाधन यथा बिजली, पानी एवं उपकरण/यंत्रों की व्यवस्था के लिए सरकार को किसानो के साथ खड़ा रहना चाहिए

(ग) सभी प्रकार के ऋणों की वसूली कम से कम 6 माह तक के लिए स्थगित होनी चाहिए और इस अवधि में किसी भी प्रकार का ब्याज या अन्य आरोपण नहीं होना चाहिए

(घ) बाजार एवं मंडियों में भी न्य से खरीद आरंभ हो, इससे नीचे खरीद को हो - दंडित करने की व्यवस्था हो, मंडियों में जो अनुज्ञापत्र धारी व्यापारियों की चैन गांवों तक बनी हुई है, उसके माध्यम से वे गांव में ही खरीद करें, जहां खरीद हुई है - वही भुगतान कर दें, खरीदी गई उपज को विक्रेता की सुरक्षा में बांड लेकर रख दे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था ठहरेगी नहीं वरन उसका संचालन निरंतरता के साथ होता रहेगा अधिकतर कार्य ऑनलाइन हो सके इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है

(ङ) किसानों को अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर या बाजार एवं मंडी में बेचने तक, घर परिवार चलाने के लिए विशेष पैकेज के अंतर्गत फसलों की अग्रिम राशि के रूप में रुपये 10,000 (दस हजार) रुपये प्रति परिवार दिया जावे, इससे अर्थव्यवस्था भी गतिमान रहेगी इस संबंध में वेयर हाउसिंग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 2007 के प्रावधानों का कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जावें समर्श समय(च) हर समय कहीं बेसहारा पशु तो कहीं जंगली जानवरों का तो, कहीं-कहीं दोनों के ही खतरे फसल पर मंडराते हैं, किसान करे तो क्या करें, जबकि मशीन नहीं, मजदूर नहीं, पकी फसल को काटकर घर लाने का प्रबंध नहीं तब भी वर्षभर परिवार का खर्च चलाने के लिए उसे तैयार फसलों की रखवाली करनी ही पड़ेगी इन कामों को भी आवश्यक सेवाओं में लिया जाना चाहिए

(छ) दूध एवं सब्जियों का संकलन, परिवहन, भण्डारण, वितरण को सहज एवं सुगम रखा जावें, इसी के साथ कृषि यंत्रों के रख - रखाव एवं मरम्मत से सम्बंधित कारीगरों को भी आवश्यक सेवाओं में सम्मिलित किया जावें

4. भेदभाव जनित अन्यायों को रोकने के लिए निम्न नीतिगत निर्णय सांगत है:4. भेदभाव जनित अन्यायों को रोकने के लिए निम्न नीतिगत निर्णय सांगत है:

(क) आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के अधीन प्रधानमंत्री आपदा प्रबंधन कोष 2009-10 में आरम्भ हुआ जिसमे 2018-19 के अंकेक्षण के उपरांत 3800.44 करोड़ रुपये शेष होना वेबसाइट पर दर्शाया हुआ है इस समय सहायता के लिए आने वाली राशि को पी. एम. आर. केयर फण्ड के खाते में डाला जा रहा है यह प्रधानमंत्री आपदा प्रबंधन कोष संसद द्वारा बनाए गए कानून के अनुसार है, जिसका खाता खुलवाने एवं उसका निर्धारित अवधि में अंकेक्षण करवाना कानून में बाध्यता है, इसको खर्च करने के लिए समिति में पक्ष-विपक्ष सहित अधिकारी भी सम्मिलित है यह व्यवस्था जनता के मन में विश्वास उत्पन्न करने वाली है । इसके उपरान्त भी नया खाता आरम्भ कर सहायार्थ संग्रह करना विश्वास को हिलाने वाला है जो इस आपात समय में सर्वथा अनुचित है

(ख) सम्पूर्ण देश से प्राप्त सहायता को आपदा प्रबंधन अधिनियम. 2005 के अधीन प्रधानमंत्री आपदा प्रबंधन कोष में संग्रह किये जाने से इस आपात समय में अधिक प्रभावी रहेगा इसी के साथ इसी कोष में से राज्यों की भागीदारी सुनिश्चित की जाकर मापदंडो के अनुसार राज्यों के खातों में राशि का अंतरण स्वत: इस व्यवस्था को विश्वसनीयता प्रदान करने के साथ ही प्रभावोत्पादक रहेगा 30 जनवरी को केरल में कोरोना से पीड़ित व्यक्ति की पहचान हो गयी थी इसके उपरान्त समय पर लॉक डाउन जैसे कदम उठा लिए जाते तो गाँवो से जीविकोपार्जन के लिए जाने वाले कमजोर वर्ग के व्यक्तियों को सड़कों पर धक्के खाकर अपमानित नहीं होना पड़ता, इससे सबक लेकर अभी भी ऐसे सभी निर्धन जनों के लिए तत्काल ठहरने एवं भोजन आदि की कारगर व्यवस्था की जानी आवश्यक है इनमे से अनेकों ने किराए पर लिए हुए या उनके ठहराव के स्थानों को खाली कराने के कारण शहरों से पलायन किया सरकारी आदेशो की पालना नहीं होने के कारण ही सड़कों पर भीड़ की स्थिति बनी जनचर्चा है कि जो स्वयं के पैसे से भारत आ सकते थे, उनको सरकारी खर्चे पर लाया गया, जिनको सरकारी सहायता की आवश्यकता थी वे पैदल चले,' जनहित में इसकी सत्यता से जनता को अवगत करना राजधर्म है

(घ) दिल्ली जैसे शहरों में भी 1 मार्च के उपरान्त आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगो के भाग लेने को रोकने में शासन एवं प्रशासन विफल ही हुए है इस प्रकार की विफलताओं के लिए उत्तरदायी पदारूढ़ शासन एवं प्रशासन के व्यक्तियों को चिन्हित कर उनके विरुद्ध समुचित कार्यवाही करने का प्रसारण किया जावें, जिससे भविष्य में इस प्रकार उदासीनता एवं कर्तव्यहीनता के कारण सामान्य जन को खामियाजा नहीं भुगतना पड़े

(ङ) केंद्र सरकार के वित्त मंत्री द्वारा 1,75,000 (एक लाख पिचहतर हजार) करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा में किसानों को अनदेखा किया है, कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता पर नहीं लिया गया जबकि सारी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि क्षेत्र है (ङ) केंद्र सरकार के वित्त मंत्री द्वारा 1,75,000 (एक लाख पिचहतर हजार) करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा में किसानों को अनदेखा किया है, कृषि क्षेत्र को प्राथमिकता पर नहीं लिया गया जबकि सारी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि क्षेत्र है (च) इसी संबंध में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के अंतर्गत लगभग साढ़े आठ करोड़ किसानो को दो हजार रुपये की किश्त देने की घोषणा के अनुसार कुल राशि लगभग सत्रह हजार करोड़ रुपये होती है, जो घोषित पैकेज का 10 प्रतिशत से कम है देश की 75 प्रतिशत जनसँख्या को 10 प्रतिशत से कम की राशि दिया जाना भेद-भाव को दर्शाता है । प्रधानमंत्री सम्मान निधि में एक दिन में किसान के परिवार के एक व्यक्ति को तीन रुपये तैतीस पैसे प्राप्त होते हैं जबकि एक कप चाय भी 5 रुपये से कम की नहीं मिलती है विधवा, वृद्धावस्था पेंशन भी 750 से लेकर 1000 रुपये प्रति व्यक्ति प्रतिमाह है सम्मान निधि की संपूर्ण परिवार के लिए राशी 500 रुपये प्रतिमाह है किसान अन्नदाता है, वे “दाता” ही बने रहना चाहते हैं, उन्हें तो उनकी उपजों का लाभकारी मूल्य चाहिए, तब उन्हें किसी भी प्रकार की अनुग्रह राशि की आवश्यकता नहीं है दूसरी ओर 85% सरकारी कर्मचारियों को प्राप्त होने वाली पेंशन एक माह में एक से डेढ़ लाख रुपए तक प्राप्त होती है, उसमें सबसे छोटे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की पेंशन राशि भी 20 से 25 हजार रुपये तक है इनकी तुलना में यह निधि - सम्मान जनक है ?, विचारणीय है सातवें वेतन आयोग के उपरांत 1 जनवरी 2016 से 1 जनवरी 2020 तक 4 वर्षों में कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी है सातवें वेतन आयोग सहित महंगाई भत्ता जनवरी से ही आरम्भ होता है, चाहे उनकी घोषणा 2 से 6 माह के विलम्ब से हो, इससे वे अप्रभावित रहते हैं काश !

 

यही सूत्र किसानों के लिए भी अपनाया जाता तो देश को किसानों की आत्महत्याओं का कलंक नहीं झेलना पड़ता डॉक्टर एम. एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग की वह अनुशंसा आज तक भी धूल चाट रही है, जिसमें किसानों की आय, सिविल कर्मचारियों से तुलना योग्य बनाने की अनुशंसा की गई है इसके लागू होने की प्रस्तावित तारीख 15 अगस्त 2007 थी, कर्मचारियों की भांति प्रस्तावित तारीख से इस अनुशंसा को लागू कर दिया जाये तो देश में एक भी किसान ऋणी नहीं रहेगा बल्कि देश का किसान ऋण मुक्त हो जाएगा, उसकी खेती की भूमि बैंकों के गिरवी नहीं रहेगी

सरकार की भेदभाव पूर्ण नीति ने किसानों की आर्थिक रूप से कमर तोड़ी है, जिससे कृषि घाटे का ही नहीं मौत का सौदा बन गई है । इसके उपरांत भी कोरोना जैसे आपात समय में भी सरकार भेदभाव की नीति को नहीं छोड़ रही है न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी भी किसानों को खुशहाल बनाने में सक्षम नहीं होती है क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सम्पूर्ण उपज की खरीद होती ही नहीं है न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से कम होते हुए भी किसानो को अपनी उपज बाजार में न्यूनतम समर्थन मूल्यों पर बेचने को विवश होना पड़ता है तिलहन एवं दलहन की खरीद में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के नाम से चल रही योजना में कुल उत्पादन में से 25% तक ही खरीद का प्रावधान हैं इसी प्रकार खरीद अधिकतम 90 दिन खरीदने की नीति ने किसानो की आय पर कुल्हाड़ी चलाने का कार्य किया है प्रकृति की मार से आहत किसानों को सहारा देने के लिए सरकार दिखाई नहीं देती, इस भेदभाव की पीड़ा को भी किसानो को सहन करना पड़ता है की पीड़ा को भी किसानो को सहन करना पड़ता है

देश में उत्पन्न परिस्थितियों को सकारात्मक भाव से लेकर भविष्य में ग्राम आधारित व्यवस्था का निर्माण किया जावें, जिसमे कृषि आधारित उद्योगों की स्थापना ग्रामों में किये जाने को प्राथमिकता दी जावें __

विनम्र प्रार्थना है कि ज्ञापन में उल्लेखित सुझावों के अनुसार शीघ्र प्रभावी कार्यवाही कर कोरोना के संक्रमण को रोका जावें इस ज्ञापन को केंद्र एवं राज्य सरकारों को भी आपकी अनुशंसा के साथ भेजा जाने का आदेश प्रदान किया जावें

भवदीय

रामपाल जाट राष्ट्रीय अध्यक्ष किसान महापंचायत बी-22, भान नगर, क्वींस रोड, जयपुर - 21

दिनांक 04.04.2020

94140-30250 rampaljatjaipur@gmail.com