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हिन्दी सिनेमा खतरे में है – तिग्मांशु धूलिया
January 20, 2020 • Yogita Mathur • BOLLYWOOD

 

जयपुरJaipur,20 जनवरी । जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल [जिफ] 2020 के तीसरे दिन कई अहम् मुद्दों पर संवाद हुआ, वहीं फिल्मों का लगातार प्रदर्शन हुआ। फिल्मप्रेमियों ने समारोह का बहुत आनन्द लिया।

 रीज़नल सिनेमा ऑफ इंडिया – टुडे एंड टुमॉरो, डाइवर्सिटी ऑफ इंडिया – रिफ्लेक्शन इन इंडियन सिनेमा सैशन हुआ। यहां गैंग्स ऑफ वासेपुर और पान सिंह तोमर के डायरेक्टर और राइटर तिग्मांशु धूलिया, बाला के लेखक निरेन भट्ट, लाल कप्तान के लेखक दीपक वेंकटेशन और इंद्रनील घोष ने हिस्सा लिया। वहीं, फिल्म मेकर गजेन्द्र क्षोत्रिय मॉडरेटर रहे।


सत्र में क्षेत्रीय सिनेमा, ख़ास कर राजस्थानी और हिन्दी सिनेमा Hindi cinemaमें आने वाली चुनौतियों के बारे में चर्चा की गई। सत्र में तिग्मांशु धूलियाTigmanshu Dhulia ने साफ़गोई से कहा कि हिन्दी सिनेमा खतरे में हैin danger,, क्षेत्रीय सिनेमा नहींnot regional cinema। चूंकि क्षेत्रीय सिनेमा जड़ों से जुड़ा हुआ है, वह कभी बाहर नहीं होगा। वहीं, चुटकी लेते हुए धूलिया ने यह भी कहा कि जिस तरह फिल्मों में गालियों की भरमार आ पड़ी है, उसकी ज़रुरत नहीं है। क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों का अपना रंग और लहजा होता है, और गालियों की जरूरत है ही नहीं।

तारक मेहता का उल्टा चश्मा जैसा शो लिख चुके नीरेन भट्ट ने कहा कि बॉलीवुड खिंचड़ी की तरह होता जा रहा है, जबकि रीज़नल कहानियां कम बन रही हैं। वहीं, सत्र में सभी वक्ताओं ने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और वेब सीरीज़ के दौर में नई कहानियों को ज्यादा स्पेस और आजादी मिलेगी। ऐसे प्लेटफॉर्म फिल्म निर्माताओं को बेहतर सिनेमा बनाने के लिए ज्यादा प्रेरित करेंगे।
 सिनेमा ऑफ चेंज, जिसमें जाने – माने फिल्म निर्देशक राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने दर्शकों से संवाद किया। फिल्म समीक्षक विनोद भारद्वाज ने मेहरा से फिल्मों से जुड़े कई सवाल किए।

दिल्ली 6, रंग दे बसंती और भाग मिल्खा भाग जैसी बड़ी फिल्में बना चुके राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने साफ कहा कि पाकिस्तान – हिन्दुस्तान और साम्प्रदायिक मसले बहुत हो चुके हैं, और अब हमें इससे आगे बढ़कर सोचना चाहिए। मेहरा ने कहा कि बचपन से विभाजन की दर्दनाक कहानियां सुनने के बाद उन पर इसका गहरा असर हुआ, और यह उनकी फिल्मों में भी कमोबेश दिखाई देता है। साथ ही मेहरा ने यह भी कहा कि बचपन में वी.शान्ताराम की फिल्म दो आंखें बारह हाथ देखने से वे अच्छा सिनेमा बनाने के लिए प्रभावित हुए। बातचीत में मेहरा ने अपनी आने वाली फिल्म उड़ान के बारे में भी बताया।

वर्ड सिनेमा बाय विमन सैशन आयोजित हुआ, जिसमें गुड न्यूज फिल्म की राइटर ज्योति कपूर, डायरेक्टर, सिनेमेटोग्राफर और मुम्बई टॉकीज की फाउंडर सीमा देसाई, तेजपाल सिंह धामा, जानी – मानी राइटर और डायरेक्टर पाखी ए. टायरवाला और अर्मिनिया की फिल्म मेकर मैरिना लिबिक ने अपनी बात रखी, वहीं वरिष्ठ पत्रकार प्रेरणा साहनी ने मॉडरेटर की भूमिका निभाई।

सत्र की शुरुआत में ही पाखी ए. टायरवाला ने खुलकर कहा कि फिल्म इंडस्ट्री महिला निर्देशकों के प्रति भेदभाव भरा रवैया रखती है, और इस इंडस्ट्री में बने रहने के लिए उन्हें दोगुना काम करने की जरुरत है। महिला फिल्म मेकर्स को उनकी फिल्मों के लिए बहुत मुश्किल से ही फंडिंग मिल पाती है। वहीं उन्होने यह भी कहा कि यह महिलाओं और पुरुषों की लड़ाई जैसा नहीं है, बल्कि उन्हें मिलकर काम करने की ज़रुरत है। सीमा देसाई ने अपनी आगामी फिल्म पप्पू की पगडंडी के बारे में बात की, वहीं राइटर ज्योति कपूर ने बताया कि कैसे उन्हें फिल्म राइटिंग के लिए क्रेडिट नहीं मिला, और उन्हें इसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।

सिनेमा और समाज: समकालीन सन्दर्भ संवाद रखा गया, जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति ओम थानवी मौजूद रहे। संवाद की अध्यक्षता प्रो नरेश दाधीच ने की, वहीं बतौर वक्ता हरिराम मीणा, राजेन्द्र बोड़ा, , प्रबोध गोविल ने अपने विचार रखे। वहीं डॉ राकेश रायपुरिया और डॉ प्रणु शुक्ला ने मेहमानों का स्वागत किया। चर्चा में सिनेमा को समाज से जुड़ा एक पात्र बताया। सिनेमा एक ऐसी कला है, जिसमें सभी कलाओं का संगम है,  और यह एक भावनात्मक कला है। उन्होंने बताया कि सिनेमा समाचार पत्रकारिता से ज्यादा प्रभावित है, और लोगो के लिए मनोरंजन का एक अच्छा साधन है। नरेश दाधीच ने  सिनेमा से समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को भी बताया। उन्होंने फाइट क्लब फिल्म का सटीक उदहारण देते हुए बताया कि अमेरिका में एक समय लोगों ने अपने दबाव को दूर करने के करने के लिए कई सारे फाइट क्लब खोले जिससे लोगो को काफी परेशानियां हुई जिसके बाद पुलिस के द्वारा इन क्लब को बंद करवाया गया। इसके अलावा हरिराम मीणा ने आदिवासी संस्कृति और समाज के बारे में बात की और बताया कि आने वाले समय में लोगो को आदिवासी संस्कृति को सहेज के रखना होगा। ओम थानवी ने बताया कि समाज है तो सिनेमा है और सिनेमा है तो समाज है। 


सोमवार को वी शान्ताराम के प्रशंसकों के लिए अपने ज़माने की मशहूर फिल्म रही पड़ौसी का प्रदर्शन किया गया। आज के दौर में जिस तरह साम्प्रदायिक भेदभाव और आपसी बैर का माहौल बन रहा है, पड़ौसी को देखना दर्शकों को कई सबक दे जाता है।

वी शांताराम की बहुचर्चित फिल्म पड़ौसी [1941] सामाजिक मुद्दों को छूती हुई फिल्म है। इस सोशल ड्रामा फिल्म को ख़ास और आज के वक्त में प्रासंगिक बनाता है इसका विषय, जो हिन्दू – मुस्लिम एकता की बात करता है। दर्शकों ने फिल्म का भरपूर आनंद उठाया।